Shelendra shukla "haldauna"

!!उम्मीद!!

जिन्दगी ख़तम हो रही फिर तू क्यों नजदीक आ रही है
मुझमें लड़ने की हिम्मत नहीं और तू हाथ थामे जा रही है

मुझे नहीं खुद पर ऐतबार क्यों तू मुझमें ख्याव देख रही है
सब कुछ लुट चुका है मेरा और तू मुझमें बाज़ार देख रही है

ख्वाहिशे मेरी मजबूर हो चली क्यों तू उम्मीद देख रही है
कदम मेरे लड़खड़ाने लगे हैं और तू मुझमें जीत देख रही है

कहानी खत्म मेरी हो चली क्यों तू नई शुरुआत देख रही है
बिस्मिल हूं में दुनिया का और तू मुझमें कायनात देख रही है

सहरा हो चुका हूं में अब तो तू क्यों मुझमें बरसात देख रही है
बंजर हूं में इस धरती का और तू क्यों मुझमें जीवन देख रही है

वक़्त आ चुका रुखसती का तू क्यों नयी मुलाकात देख रही है
पंख मेरे टूटकर बिखर गए और तू क्यों मुझमें उड़ान देख रही है

शैलेंद्र शुक्ला ” हलदौना”

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