Shelendra shukla "haldauna"

नजर नहीं आती मंजिल!!

नजर नहीं आती मंजिल क्यों सफर खत्म नहीं होता
जितने कदम आगे रखूं उतनी दूर होती जाती है परछाईं !!
क्यों दिखती नही जमीं क्यों समुंदर का अंत नहीं होता
जितना कोशिश करता हूं छूने की बढ़ती जाती है गहराई!!
क्यों घड़ी रुकती नहीं क्यों मौत पर हमें यकीन नहीं होता
जितना जिंदगी को चाहता हूं उतनी ही करती ये वेबफाई!!
नजर नहीं आती मंजिल क्यों सफर खत्म नहीं होता
जितने कदम आगे रखूं उतनी दूर होती जाती है परछाईं !!
बदली छटती नही आसमान के उस पार कुछ नही होता
जितना दूर तक जाता हूं उतने पास आही जाती है तन्हाई!!
जिंदगी समझ नही आती हकीकत का पता नही होता
जितने नजदीक जाता हूं उतनी दूर होती जाती है रानाई !!
आंखों से रोशनी दिखती नही फिर भी सब नजर है आता
मंजिल के करीब जब आता हूं तो आ जाती है फिर विदाई !!
नजर नहीं आती मंजिल क्यों सफर खत्म नहीं होता
जितने कदम आगे रखूं उतनी दूर होती जाती है परछाईं !!
शैलेंद्र शुक्ला ” हलदौना”

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