Shelendra shukla "haldauna"

सुवेरा कविता संग्रह

कहानी मुकम्मल नहीं होती!!!

इश्क अब हमारा बेपर्दा सा हो गया हैमदारी के खेल का तमाशा सा हो गया है!!रात को मरने मिटने की कसमें खाते हैंसुबह अपने अपने काम पर चले जाते हैं !!रोज इस बेगरत दुनिया से बगावत होती हैशाम ढलते ढलते आपस में अदावत होती है!!बात आसमान से तारे तोड़ने से कम नही करते हैंएक गुलाब […]

खुद से बात कर लू

मन कुछ बेचैन है जरा खुद से भी बात कर लूकुछ उससे से भी कहूं कुछ उसकी भी सुन लूशैलेन्द्र शुक्ला “हलदौना”


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